Kanwar ( Scheduled Tribe )

Comments · 32 Views

कंवर ( अनुसूचित जनजाति ) की उत्पत्ति विवरण

भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का मूल आधार प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन रहा है। एक समय ऐसा भी था जब इस धरती पर केवल जल, जंगल, जमीन, पेड़-पौधे और जीव-जंतु ही विद्यमान थे। समय के साथ धीरे-धीरे मानव समूह इस धरती पर आए और उन्होंने प्रकृति की गोद में रहकर जीवन जीने की कला सीखी। इन मानव समूहों ने हजारों वर्षों तक प्रकृति के नियमों, उसकी लय और उसके संतुलन को समझते हुए अपने जीवन को व्यवस्थित किया।

प्रकृति के साथ गहरे संबंध के कारण उन्होंने अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक नियमों का निर्माण किया। ऋतुओं के परिवर्तन—जैसे धूप, गर्मी, वर्षा और ठंड—के साथ तालमेल बैठाकर उन्होंने अपने जीवनयापन के तरीके विकसित किए। इसी प्रकृति की लय से प्रेरित होकर तीज-त्यौहारों की परंपरा विकसित हुई, और प्रकृति की ध्वनियों व वातावरण से प्रेरणा लेकर नृत्य, गीत और संगीत की समृद्ध परंपराएँ जन्मीं।

प्रकृति के संरक्षण और उसके संतुलित उपयोग की आवश्यकता को समझते हुए इन समुदायों ने अपने सामाजिक ढांचे को सुदृढ़ बनाया। गोत्र व्यवस्था, गुड़ी तथा गाँवों की स्थापना इसी सोच का परिणाम है, जिससे समाज में अनुशासन, एकता और सामुदायिक सहयोग की भावना विकसित हुई। हजारों वर्षों तक प्रकृति के सानिध्य में विकसित यह महान जीवन-पद्धति और संस्कृति आज आदिवासी संस्कृति के नाम से जानी जाती है, जो मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासतों में से एक है।

इन्हीं महान प्रथम मानव समुदायों में से एक कंवर जनजाति भी है। कंवर समाज ने भी अपनी प्राचीन आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को हजारों वर्षों से संरक्षित रखते हुए अपने समाज को संगठित और व्यवस्थित रूप से संचालित किया है। इस समाज की जीवन शैली में प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक एकता, सहयोग, परंपराओं का संरक्षण और सामाजिक अनुशासन की विशेष भूमिका रही है।

कंवर समाज में निम्न प्रमुख उपसमूह सम्मिलित हैं –

•    पैकरा कंवर

•    बडईला कंवर

•    राठिया कंवर

•    दूध कंवर

•    चांटी कंवर

•    चेरवा कंवर

•    कमलवंशी कंवर

•    तंवर कंवर

इन सभी को भारत के संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 के भाग-XX छत्तीसगढ़ सूची में क्र. 20 के तहत कंवर जनजाति का प्रमाणपत्र प्राप्त है।

3. कंवर जनजाति का निवास क्षेत्र-

कंवर जनजाति मुख्यतः मध्य भारत के विभिन्न राज्यों में निवास करती है। इनकी सबसे अधिक आबादी छत्तीसगढ़ में पाई जाती है, विशेषकर सरगुजा, कोरिया, सूरजपुर, बलरामपुर-रामानुजगंज, जशपुर, रायगढ़, कोरबा, बिलासपुर, मुंगेली, जांजगीर-चांपा, महासमुंद और रायपुर क्षेत्रों में। छत्तीसगढ़ में कंवर समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता प्राप्त है।

कंवर जनजाति मध्य प्रदेश के अनूपपुर, शहडोल, उमरिया, डिंडोरी, मंडला, बालाघाट, सिंगरौली और आसपास के क्षेत्रों में भी निवास करती है। इसके अतिरिक्त झारखंड के कुछ हिस्सों, विशेषकर पलामू, गढ़वा और लातेहार क्षेत्रों में भी कंवर समुदाय के लोग पाए जाते हैं। ओडिशा, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी इनकी छोटी-छोटी बस्तियां मिलती हैं।

कंवर जनजाति का निवास प्रायः वनांचल, पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहा है। ऐतिहासिक रूप से इनका जीवन जंगल, कृषि, पशुपालन और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहा है। वर्तमान समय में शिक्षा, रोजगार और आजीविका के अवसरों के कारण कंवर समुदाय के लोग शहरों तथा अन्य राज्यों में भी बसने लगे हैं, फिर भी उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक परंपराएं मुख्यतः मध्य भारत के ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं।

कंवर जनजाति के गोत्रों को मुख्यतः चार वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है—

(1) जीव-जंतुओं के नाम पर आधारित गोत्र—जैसे कुकरी/खुखरी/मुगी, बोकरा, कुकुर, सिकटा, बिच्छी, सुगा, मैना, बेंग, बांदी (मछली), बिलाई/बिलवा, नाग, दूनाग, डोंड़िया, करायत, गोबरिला, उड़ागेन, पंडकी, हुडंरा, हाथी, भैंसा, सांड, बरहा, बघवा, चितवा, सोनचितवा, गौरैया, राइगिनी इत्यादि।

(2) पेड़-पौधों के नाम पर आधारित गोत्र—जैसे परसा, डूमर, वनफूल, पईफूल, सोनबोइर, मिरची, सनमोंगरा इत्यादि।

(3) गुणों अथवा व्यवसायों के नाम पर आधारित गोत्र—जैसे बरगाय, राउत, अहीरा, बाघ डहरिया, बिरतिया, घसिया, बेरवा, छेरका, कहार, पंडो, मांझी इत्यादि।

(4) आविष्कारों, उपकरणों अथवा वस्तुओं के नाम पर आधारित गोत्र—जैसे छत्तर, कपाट, दर्पण, ठाठ, झांप, चांता, रघरा, ढेंकी, भंवरवाल, विपनिया, कोटविपनिया, करसा, करसी, कोठी, वाक, वाकठेला, धनुष, धनुषबाण, खंडा/खांड़ा, रक्सा, जुहारी (नांगर-जुहा) इत्यादि।

यदि कंवर जनजाति की अपनी कोई कंवरासी भाषा रही होगी, तो वह अब विलुप्त हो गई है या वर्तमान भाषा में मिश्रित हो गई है। किंतु इनके गोत्रों के मूल नामों में कंवरासी भाषा के शब्द आज भी जीवित हैं। एक विश्लेषण के मुताबिक, कंवर जनजाति के लगभग आधे से अधिक गोत्रों के नाम उनकी मूल कंवरासी भाषा के शब्दों से बने हो सकते हैं। अधिकांश गोत्रधारियों को अपने गोत्र के नामों का अर्थ मालूम है, लेकिन मूल भाषा के विलुप्त हो जाने के कारण कुछ गोत्रधारियों को अपने गोत्र के नामों का अर्थ ज्ञात नहीं है।

कंवर समाज के लिए प्रकृति केवल जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक चेतना का अभिन्न अंग है। प्रकृति के प्रति श्रद्धा, लगाव और सम्मान पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपराओं में दिखाई देता है। इसी भावना के कारण प्रकृति के संरक्षण, संवर्धन और उसके प्रति कृतज्ञता का भाव कंवर समाज के जीवन-मूल्यों में विशेष महत्व रखता है।

कंवर जनजाति मूलतः तीन शक्तियों को मानती है—

1. पुरखा देव

कंवर जनजाति के सबसे प्रमुख देव पुरखा देव माने जाते हैं। मान्यता है कि कंवर जनजाति का कोई व्यक्ति मृत्यु के उपरांत स्वर्ग या नरक में नहीं जाता, बल्कि वह पुरखा देवों में शामिल होकर स्वयं पुरखा देव बन जाता है।

पुरखा देवों की सेवा एवं पूजा से प्राप्त प्रसाद मुख्यतः उसी गोत्र के व्यक्तियों को खिलाया जाता है। पुरखा देवों के लिए सुमिरन किया जाता है, जिसे पवित्र माना जाता है और गोपनीय रखा जाता है।

2. स्थानीय जागृत शक्तियाँ

स्थानीय जागृत शक्तियों में आसपास के वे सभी स्थानीय देवी-देवता एवं शक्तियाँ शामिल हैं, जिनसे कंवर समाज का व्यक्ति आध्यात्मिक एवं पारलौकिक जुड़ाव महसूस करता है।

प्रत्येक गाँव में डीह-डीहारिन, महांदेव, सिंघरिया देवता, सरना देवी या देवता आदि की मान्यता देखने को मिलती है। इसके अतिरिक्त पूरे सरगुजा क्षेत्र में कुदरगढ़ी (कुदरगढ़), डढ़गोइहाँ ठाकुर, कोहिल खंटू, खोंपा देवता (दानव देवता), रनपुरहीन दाई, झगराखांड़ देवता, बइगनु देवता (रामगढ़) आदि स्थानीय देवी-देवताओं एवं शक्तियों की भी मान्यता प्रचलित है।

स्थानीय जागृत शक्तियों के लिए भी सुमिरन किया जाता है, जिसे पवित्र माना जाता है और गोपनीय रखा जाता है। इसके अतिरिक्त इन शक्तियों की सेवा एवं आराधना के अवसर पर सेवा गीत भी गाए जाते हैं। इन सेवा गीतों की मुख्य धुन सामान्यतः एक ही होती है, किंतु इनके बोल स्थान, समय और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।यदि आप चाहें तो इसी तरह “3) प्रकृति की पूजा” वाला भाग भी इसी भाषा और शैली में तैयार किया जा सकता है।

3. प्रकृति

कंवर जनजाति प्रकृति और उसके विभिन्न अवयवों को विभिन्न प्रकार से, विभिन्न स्वरूपों में तथा विभिन्न अवसरों पर मानती है। जैसे—पेड़, पहाड़, जंगल आदि को कभी देवी-देवता के रूप में तथा कभी केवल पवित्र मानकर उनकी पूजा एवं सम्मान किया जाता है।

कंवर समाज का व्यक्ति सामान्यतः प्रकृति को पवित्र मानता है और उसके प्रति गहरा लगाव, श्रद्धा एवं सम्मान रखता है। प्रकृति को जीवन का आधार मानते हुए उसके संरक्षण एवं संवर्धन की भावना भी कंवर समाज की परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

समुदाय में प्रचलित विशेष पर्व एवं त्यौहार-
सरगुजा क्षेत्र में कंवर जनजाति द्वारा अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप विभिन्न पर्व एवं त्यौहार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। इनमें प्रमुख रूप से कठोरी (बाएर) त्यौहार, भाई दूज, नवाखाई, मरपक, करमा, दशाई, छेरता, फागुन, नवरतनी, सुगा त्यौहार तथा डंडा त्यौहार आदि शामिल हैं।

Comments