Kanwar Social Customs and Traditions

टिप्पणियाँ · 35 विचारों

कंवर सामाजिक रीति-रिवाज एवं संस्कार

1.  जन्म संस्कार

   1.   नामकरण संस्कार : शिशु का नाम जन्म से पूर्व विचार कर सुनिश्चित किया जाना उचित होगा, ताकि जन्म के समय ही नामकरण किया जा सके और परिवार एवं समाज में उसी नाम से पहचान स्थापित हो सके।

2.   जन्म पंजीकरण : शिशु का जन्म प्रमाण पत्र ग्राम पंचायत / वार्ड परिषद / चिकित्सालय से अनिवार्य रूप से प्राप्त किया जाएगा, ताकि सभी शासकीय अभिलेखों में सही नाम एवं विवरण दर्ज हो सके।

3.   सरकारी दस्तावेज अनिवार्यता : शासन द्वारा प्रदत्त जन्म प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य होगा, क्योंकि यह शिशु के भविष्य, शिक्षा एवं सरकारी सुविधाओं के लिए आवश्यक दस्तावेज है।

4.   छठी संस्कार : शिशु के जन्म के पश्चात लगभग छठवें दिन या आवश्यकतानुसार छठी संस्कार का आयोजन किया जाएगा। इसमें नाई, धोबी एवं कोसराईन (सुइन) की परंपरागत सेवाएँ ली जा सकती हैं। इन सेवाओं हेतु केवल उचित एवं सम्मानजनक पारिश्रमिक (बनी/मेहताना) दिया जाएगा, जिसकी दर ग्राम या ब्लॉक स्तर पर निर्धारित की जाएगी।

5.   मुंडन संस्कार : छठी संस्कार के अवसर पर मुंडन संस्कार किया जा सकता है। यदि किसी परिवार की अन्य आदिवासी देवस्थलों या परंपराओं में मुंडन की अलग प्रथा है, तो उसे स्वतंत्रता प्रदान की जाएगी।

6.   बरही संस्कार : शिशु के जन्म के बारहवें दिन बरही संस्कार संपन्न किया जाएगा। इस दिन माता एवं शिशु को सांकेतिक रूप से पवित्र किया जाता है, जिससे प्रसूता माता सामान्य दैनिक एवं पारिवारिक कार्यों में पुनः सक्षम हो सके।

7.   अन्नप्रासन संस्कार : अन्नप्रासन संस्कार सामान्यतः नाना-नानी अथवा बाबा-बरदाई द्वारा सम्पन्न कराया जाएगा। यह संस्कार सरल एवं संक्षिप्त रूप में किया जाना चाहिए।

8.   धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा : जन्म संस्कार से संबंधित सभी धार्मिक एवं पारंपरिक अनुष्ठान कंवर समाज या आदिवासी बैगा/पुजारी द्वारा ही सम्पन्न किए जाएंगे, जिससे परंपरा एवं सांस्कृतिक शुद्धता बनी रहे।

9.   आर्थिक संयम एवं सामाजिक संदेश : जन्म संस्कार अथवा जन्मोत्सव (बर्थडे पार्टी) में अनावश्यक एवं दिखावटी खर्च से बचने की सलाह दी जाती है। सरलता, परंपरा एवं सामाजिक सामंजस्य को प्राथमिकता दी जाएगी।

2.  विवाह संस्कार  (सामान्य नियम एवं प्रक्रिया)

     1.   मूल सिद्धांत एवं उद्देश्य

·         विवाह कंवर जनजाति की आदिवासी परंपरा एवं संस्कृति के अनुसार ही संपन्न होगा।

·         विवाह में अनावश्यक खर्च, दिखावा, उधारी एवं दहेज प्रथा का पूर्णतः निषेध रहेगा।

·         विवाह की व्यवस्था ऐसी हो कि आर्थिक रूप से कमजोर एवं संपन्न दोनों परिवार समान सम्मान के साथ विवाह संपन्न कर सकें।

·         समाज में फैल रही कुरीतियाँ जैसे नशापान, अत्यधिक खर्च, कोर्ट-कचहरी विवाद आदि को रोकना समाज की जिम्मेदारी होगी।

2.   समय एवं आयोजन व्यवस्था

·         विवाह कार्यक्रम यथासंभव दिन में एवं प्रातःकाल आयोजित किया जाएगा।

·         विशेष परिस्थितियों में रात्रि विवाह की अनुमति दी जा सकती है।

·         विवाह संबंधी सभी कार्यक्रम सामान्यतः तीन दिनों में संपन्न किए जाएँगे।

3.   सामाजिक मर्यादा एवं प्रतिबंध

·         एक ही गोत्र में विवाह पूर्णतः प्रतिबंधित एवं अमान्य होगा।

·         ममेरे-फुफेरे संबंधों में विवाह भी निषिद्ध रहेगा। क्षेत्रीय संगठन मानवीय पहलू को ध्यान में रखकर सामाजिक दंड भी कर सकता है।

·         बाल विवाह पूर्णतः प्रतिबंधित है। (न्यूनतम आयु: वर 21 वर्ष, वधु 18 वर्ष)

·         दहेज लेना-देना दंडनीय अपराध होगा। कंवर आदिवासी संस्कृति में भी दहेज प्रथा कभी नहीं रही है। अतः कन्या पक्ष स्वेच्क्षा से विवाह सामग्री भेंट कर सकता हैं। सगा-संबंधी सामान के बदले नगद राशि देना सुनिश्चित करें। सगा-सम्बन्धियों द्वारा वर / वधु को सामान / बर्तन / उपहार देने की प्रथा अनुपयोगी और अनावश्यक है। अतः इसे बंद करना ही होगा।

4.   रिश्ता तय करने की प्रक्रिया

·         विवाह संबंध तीन चरणों में कुटुंब की उपस्थिति में जाँच-परख कर तय किया जाएगा।

·         लड़का एवं लड़की को एक-दूसरे को समझने का अवसर दिया जाएगा।

·         युवाओं के आपसी परिचय हेतु समय-समय पर समारोह/सम्मेलन आयोजित किए जाएँ।

·         लड़की पक्ष को भी स्वतंत्र रूप से रिश्ता देखने का अधिकार होगा।

·         तिहारी/मंगनी के पश्चात रिश्ता टूटने पर दोषी पक्ष ₹11,000/- हर्जाना देगा।

5.   पारंपरिक रस्में एवं प्रथाएँ

·         बिहा मंगाई में गुड़-चिवड़ा, चपरी रोटी व गुरहा रोटी ले जाना अनिवार्य है।

·         गलचुमी में लड़की का पोशाक, फल, गुड़-चिबड़ा, चपरी रोटी व गुरहा रोटी ले जाना अनिवार्य है।

·         गलचुमी में गांव के कुटुंब को लेना अनिवार्य है। जिसमें जाने की संख्या सामान्यतः 50 निर्धारित किया जाता है। संख्या आपसी सहमति से तय करें। यथा संभव दिखावा से बचा जावे।

·         गलचुमी के दिन दोनों पक्षों की सलाह से विवाह की तिथि / माह तय किया जावे।

6.   आर्थिक नियम एवं उपहार व्यवस्था

·         शादी-विवाह में परिवार के आमंत्रित अतिथियों को कपड़े देने और वर / वधु को सामान / बर्तन / उपहार देने की प्रथा वर्तमान समय में अनुपयोगी है, अतः इसे बंद करने का सुझाव दिया जाता है। बल्कि इसके बदले नगद राशि दिया जाए, जिसे वर /वधु पक्ष आवश्यकतानुसार सही तरीके से उपयोग कर सके।

·         विवाह में सुक की राशि को दोनों पक्ष आपसी सहमति से तय करें। यह बहुत अधिक ना हो। सामान्यतः सुक की राशि को 1111/- निर्धारित किया जाता है।

·         शादी-विवाह के दिन मड़वा के नीचे मिले बंदावन / पूजा में इकठ्ठा हुआ पैसा सिर्फ लड़की के परिवार के पास जाना चाहिए। इसमें पुजारी वगैरह किसी का हक़ नहीं है।

7.   बारात एवं आयोजन नियंत्रण

·         बारातियों की संख्या सामान्यतः 50 तक सीमित होगी (आपसी सहमति से परिवर्तन संभव)।

·         वर पक्ष बारातियों की सही संख्या पूर्व में बताएगा। ताकि दुल्हन पक्ष बारातियों के रहने तथा भोजन-पानी की उचित व्यवस्था कर सके।

·         अव्यवस्था होने पर दोषी पक्ष पर अधिकतम ₹10,000/- तक दंड लगाया जा सकता है।

·         लौकड़हिन्/ढेड़हिन् की संख्या सामान्यतः 5 तक सीमित होगी। हालाँकि दोंनों पक्ष आपसी सहमति से इसे कम या ज्यादा भी कर सकते हैं।

8.   विवाह संपन्न एवं विदाई

·         कन्या की विदाई यथासंभव शीघ्र संपन्न की जाएगी।

·         विवाह में सभी रस्में आदिवासी बैगा/पुजारी द्वारा संपन्न होंगी।

9.   विशेष विवाह प्रावधान

·         आदर्श सामूहिक विवाह को समाज में मान्यता एवं प्रोत्साहन दिया जाएगा, बशर्ते यह पूर्णतः कंवर आदिवासी रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हो।

·         यह विवाह समाज के गौरव, सम्मान एवं परंपराओं को अक्षुण्ण रखते हुए आयोजित किया जाएगा।

·         सामूहिक विवाह एक निश्चित तिथि एवं स्थान पर, पूर्व नियोजन एवं आवेदन प्रक्रिया के माध्यम से आयोजित किया जाएगा।

·         इस प्रकार के विवाह का आयोजन केवल समाज द्वारा ही अपने सामाजिक स्थल पर किया जाएगा।

·         विवाह की सभी रस्में एकल विवाह के समान पूर्ण रूप से संपन्न होंगी; अंतर केवल इतना होगा कि इसमें एक साथ अनेक जोड़ों का विवाह कराया जाएगा।

·         इच्छुक होने पर शासकीय योजनाओं (जैसे मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना) का लाभ लेने हेतु संबंधित विभाग (महिला एवं बाल विकास / कलेक्ट्रेट) से पूर्व समन्वय किया जा सकता है।

·         विवाह को सफल बनाने हेतु आवश्यक प्रचार-प्रसार किया जाएगा।

·         यथासंभव माघ (जनवरी) से जेठ (जून) के मध्य प्रत्येक माह एक निर्धारित तिथि पर आयोजन किया जाना उपयुक्त होगा।

·         विधुर या विधवा विवाह (बंदवा विवाह / चूड़ी प्रथा) समाज में प्रचलित है। इससे विधुर या विधवा को अपनी नई जिंदगी शुरू करने का पवित्र अवसर मिलता है। इससे समाज में न्याय, संतोष और सौहार्द भी बना रहता है। बंदवा विवाह में लड़की के लिए सामान्य पोषाक की व्यवस्था लड़‌का द्वारा किया जाता है। चूड़ी पहनाने के पश्चात् अपने गांव के कुटुम्बों का भात खिलाने का प्रावधान है।

·         समाज के भीतर प्रेम विवाहः अलग-अलग गोत्र के समाज के लड़का-लड़की आपस में प्रेम विवाह कर लेते हैं या अविवाहित लड़का-लड़की समाज में माता-पिता के इच्छा के विरूद्ध पति-पत्नी संबंध स्थापित कर लेते हैं तो ऐसी स्थिति में समाज उसे दण्ड एवं कुटुम्ब भोज लेकर समाज में मान्यता प्रदान कर सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों पक्षों से 10,000-10,000/- रूपये की सामाजिक दण्ड राशि लेकर दोनों पक्षों द्वारा उनका विवाह संपन्न कराया जावे। विवाह पश्चात् दोनों पक्षों द्वारा कुटुम्बों को एक पक्की भात खिलाने का प्रावधान है। एक ही गोत्र में विवाह वर्जित है।

    10. तलाक एवं सामाजिक दंड

·         तलाक / छोर-छुटी (बूंदा) की राशि:

o   सामान्य तलाक / छोर-छुटी की स्थिति में ₹30,000/- (तीस हजार रुपये) समाज द्वारा निर्धारित रहेगा।

o   असामान्य या विवादित मामलों में बूंदा की राशि अधिक हो सकती है।

o   ऐसी स्थिति में राशि का निर्धारण सभा या समिति द्वारा परिस्थितियों को देखते हुए किया जाएगा।

·         राशि का वितरण: विवादित मामलों में निर्धारित बूंदा राशि

o   1/4 (एक चौथाई) हिस्सा समाज को दिया जाएगा।

o   शेष राशि पीड़ित पक्ष को प्रदान की जाएगी।

·         न्यायालय जाने की स्थिति:

o   यदि कोई पक्ष विवाह विच्छेद के मामले में न्यायालय (कोर्ट) की शरण लेता है, तो:

o   वह व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार होगा।

o   समाज की सभा या समिति उसके पक्ष में हस्तक्षेप नहीं करेगी।

    11. दूल्हा पक्ष द्वारा पोशाक व्यवस्था

·         विवाह के समय दूल्हा पक्ष द्वारा निम्न पारंपरिक वस्त्र लाना अनिवार्य होगा:

o    दुल्हन का संपूर्ण पोशाक

o    माय कापर (परिवार की बड़ी/चाची हेतु 1-1 नग)

o    आजी बेन्द्री – 1 नग

o    डेढ़ सास – 1 नग

o    भौजाई लुगा (मड़वा में उपस्थित प्रत्येक भौजाई हेतु 1-1 नग)

o    सारा धोती – 1 नग

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