Kanwar Samaj ka niyamawali Surguja Chhattisgarh

कंवर समाज

जिला सरगुजा की सामाजिक नियमावली 2026

(अनुमोदन के लिए ड्राफ्ट नियमावली)

प्रस्तावना

भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का मूल आधार प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन रहा है। एक समय ऐसा भी था जब इस धरती पर केवल जल, जंगल, जमीन, पेड़-पौधे और जीव-जंतु ही विद्यमान थे। समय के साथ धीरे-धीरे मानव समूह इस धरती पर आए और उन्होंने प्रकृति की गोद में रहकर जीवन जीने की कला सीखी। इन मानव समूहों ने हजारों वर्षों तक प्रकृति के नियमों, उसकी लय और उसके संतुलन को समझते हुए अपने जीवन को व्यवस्थित किया।

प्रकृति के साथ गहरे संबंध के कारण उन्होंने अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक नियमों का निर्माण किया। ऋतुओं के परिवर्तन—जैसे धूप, गर्मी, वर्षा और ठंड—के साथ तालमेल बैठाकर उन्होंने अपने जीवनयापन के तरीके विकसित किए। इसी प्रकृति की लय से प्रेरित होकर तीज-त्यौहारों की परंपरा विकसित हुई, और प्रकृति की ध्वनियों व वातावरण से प्रेरणा लेकर नृत्य, गीत और संगीत की समृद्ध परंपराएँ जन्मीं।

प्रकृति के संरक्षण और उसके संतुलित उपयोग की आवश्यकता को समझते हुए इन समुदायों ने अपने सामाजिक ढांचे को सुदृढ़ बनाया। गोत्र व्यवस्था, गुड़ी तथा गाँवों की स्थापना इसी सोच का परिणाम है, जिससे समाज में अनुशासन, एकता और सामुदायिक सहयोग की भावना विकसित हुई। हजारों वर्षों तक प्रकृति के सानिध्य में विकसित यह महान जीवन-पद्धति और संस्कृति आज आदिवासी संस्कृति के नाम से जानी जाती है, जो मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासतों में से एक है।

इन्हीं महान प्रथम मानव समुदायों में से एक कंवर जनजाति भी है। कंवर समाज ने भी अपनी प्राचीन आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को हजारों वर्षों से संरक्षित रखते हुए अपने समाज को संगठित और व्यवस्थित रूप से संचालित किया है। इस समाज की जीवन शैली में प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक एकता, सहयोग, परंपराओं का संरक्षण और सामाजिक अनुशासन की विशेष भूमिका रही है।

वर्तमान समय में जब समाज तेजी से आधुनिकता और वैज्ञानिक प्रगति की ओर अग्रसर है, तब यह आवश्यक हो गया है कि अपनी मूल संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए समाज के संगठन और विकास को और अधिक सुदृढ़ किया जाए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कंवर समाज विकास समिति, जिला सरगुजा द्वारा समाज की परंपराओं, सामाजिक व्यवस्थाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए यह सामाजिक नियमावली तैयार की गई है।

इस नियमावली का मुख्य उद्देश्य कंवर समाज में अनुशासन, एकता, सहयोग, सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता को बनाए रखते हुए समाज के चहुंमुखी एवं सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करना है। यह नियमावली समाज के विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक क्रियाकलापों के लिए मार्गदर्शक के रूप में कार्य करेगी और समाज के संगठन को मजबूत बनाएगी।

समय के साथ समाज में सकारात्मक सुधार और परिवर्तन की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए समाज के प्रबुद्धजनों एवं सदस्यों के सुझावों का सदैव स्वागत किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर इस नियमावली में संशोधन, परिवर्तन अथवा नए नियम बनाने का अधिकार कंवर समाज विकास समिति, जिला सरगुजा के पास सुरक्षित रहेगा।

इस नियमावली का पालन समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए आवश्यक होगा। नियमावली के उल्लंघन की स्थिति में समाज द्वारा निर्धारित प्रावधानों के अनुसार उचित सामाजिक दंड का प्रावधान भी रहेगा, जिससे समाज में अनुशासन और व्यवस्था बनी रहे।

प्रस्तावना एवं मूल सिद्धांत

“यह नियमावली ‘कंवर समाज विकास समिति, जिला सरगुजा’ की सामाजिक नियमावली – 2025 के नाम से जानी जाएगी। इसका प्रभाव क्षेत्र जिला सरगुजा के समस्त कंवर समाज पर लागू होगा तथा विशेष परिस्थितियों में सीमावर्ती जिलों के कंवर समाज पर भी इसकी मान्यता एवं प्रभावशीलता रहेगी। यह नियमावली अगली संशोधित नियमावली के विधिवत पारित होने तक प्रभावी एवं लागू रहेगी।”

1.   नियमावली: “नियमावली” से आशय सरगुजा कंवर समाज की सामाजिक नियमावली – 2025 से है।

2.   कवरः कंवर से आशय आदिवासी कंवर जनजाति से है, जो अनादि काल से उत्तरी छत्तीसगढ़ और मध्य-पूर्वी भारत के भौगोलिक क्षेत्र में विद्यमान हैं। जो हजारों-हजार साल पहले सरगुजा भौगोलिक क्षेत्र में कदम रखने वाले एवं निवास करने वाले प्रथम मानव समूहों के वंशज हैं और महान आदिवासी संस्कृति के वाहक हैं।

कंवर समाज में निम्न प्रमुख उपसमूह सम्मिलित हैं –

•    पैकरा कंवर

•    बडईला कंवर

•    राठिया कंवर

•    दूध कंवर

•    चांटी कंवर

•    चेरवा कंवर

•    कमलवंशी कंवर

•    तंवर कंवर

इन सभी को भारत के संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 के भाग-XX छत्तीसगढ़ सूची में क्र. 20 के तहत कंवर जनजाति का प्रमाणपत्र प्राप्त है।

कंवर गोत्रावली:- अंधियारी, अलिहारी, अहीर, आडील, आडूल, आडूलदूल्हा, एडवा/आंडील, कटकबेसरा, कटारी, कथिला, कदीया, कपाट, कपिला, कपूर, कपूरविलास, कपूरसार, कफन, करछुल, करताल, करनसुआ, कलियारी/करयाली, करसा, करसायल, करसी, कराती, करायत, करौवा, कलारी, कच्छप-कश्यप, कसोदी, कहार, कापू/कापूडेहरी, कायेस्त, कारिकेदार, कारी, कारिहरिपाल, कारीपारो, काशिर, कुंवर, कुहरा/कुईरा, कुकरा, कुब्जा, कुर्सी, केंवच, केदारभाव, केवांस, कोंगउडागन, कोटचिपनिया, कोठी, कोडिया, कोढ़ी, कोपर, कोरवार, कोरिया, कोलिहा, कोल्हूपरधान, कौशी, खण्डभुंडी, खंडा/ खाडा, कडबडखईया, कडबडखिला, खरबाज, खसरा, खूंटी, खुखरी/ कुकरी, खुम्बरी, खुसर, खूंटा, खोभा, गंगा/गंगासागर, गंगाकरछुल, गंजी, गंधेर, गंधेल, गरुड़, गायग्वाल, गिरविनी, गुगती/गुप्ती, गोठराल, गोबर्रा/गोबिरला, गोरा, गोसाई, गौरईया, घंटा, घंसिया, घटोर, घाट/घाटी, घाटघुमर, घीव, घीवकुंडी, घुघवा, घोंघार, घोंसू, चन्दन, चंवर/चांवर/परहा, चन्द्र, चन्द्रमा, चमरबंबडकइया, चरखा, चलाकर, चाक, चाकठेला, चिपनिया, चीता, चेनगा, चेरमा, चेरवा, चोबुर, चोरभा, छत्तर, छाता, छाया/ छापा, जगझांप, जनेउ, जमकातन, जांता/ जतरा, जुड़ा, जुड़ावन, जुवाड़ी, जोंक/जोंकगंगा, जोईडा, जोतगंगा, जोपसू, झांप, झांपई, झालेरचम्पा, टोला, ठाठ, ठाठपलान, ठाठबाड़ी, ठाठमुड़रा, ठाठमुर्रा, ठसरा, ठिलेहा, डहरिया, डिलेहा, डीला, डूमर, डोंगी, डोंडीया, ढंकबिलरा, ढांस, ढिकोडी, ढेंकी, ढेला, तलवारबाघ, तसरा, तापर, तिलसगर, तुअर, तुलसी/तुलासी, तेलासी, तोमर, थइला, थिपनिया, दमकाचर, दर्पण, दलपति, दूंधकंवरा, दुधनाग, धनकुंवर, धनकुट्टा, धनफुल, धनुष, धनुषबाण, धनुहार, धरिया, धुरकुर/ धनगुढ, नखवोदर, नगदादर, नरहेल, नवकुंजलबाघ, नाग, नायक, नूनमुतरिया, नोईकरसाल, पंचारी, पंकड़ी, पईनार, पईफुल, पकरिया, पखना, पनागेर, पनारी, परचाली, परतमुख, परधिया, परबाना, परास, पलाएन/पलान, पण्डो, पाकडेहरी, पुजेरी, पेनारी, पोथा/पांथा, पोयगा, पोरगा, पोसला, परधान, फरसा/परसा, फूल, फुलकुंवर, फुलबंधिया, फुलबगिया, फौरियाब, बंदरा, बंसरा, बकरा/बोकरा, बक्खर, बघनी, बघेल, बनछोर, बरगाय/बरगई, बरदाह, बरहामड, बांदी, बांदू, बांबर, बाघ/बघवा, बाघडहरिया, बाघमुड़ी, बघरिया, बाज, बाजनघंटी, बाड़ी, बादल, बाधुर, बाबा, बिछी, बिरतिया, बिरान्हीया, बिलाई/बिलवा, बुगवा, बुधनायक, बेंग, बयास, बेखर/बखरे, बेलचोर, बेलपाती/ बेलवाती, बेलसी. बेसरा, बंजारी, बोदर, बरम्हा, भंडारी, भंवर, भगदोनहिया, भरौं, भंवरजाल, भामा, भुंडी, भुंईधरिया, भुसाडी, भेड़िया, भैंसा, भौमिरी/भवामिरी, मंजी, मछली, मतियो, मदगिरी, मनखिया, मनोबियाकंवर, मांझी, मालागार, मिरचाले, मिरची, मिरी, मुंगेल, मुखिया, मुढ़ी, मुंडरा, मुर्गी, मुर्रा, मेघछतरी, मैना, मोतिकुन्वर, मोरगा, रक्छ,रक्सा, रगड़मल, रघरा, रघरी, रतैहा/ रताईहा, रनकंकन, रंनकुवर, रनपवन, रनबाज, रनभंवर, रसकफ़न, राइगिधनी, राउतबाड़ी, राजाकरी, राजेसगर, रावत, राहिना, रूहेल, रोधक, रोहाल, लहरी, लिबरी, लेसर, लोडिया, लोढ़ा, संचरहा, सउतासिंह/सोलंकी, सघार, सनमानी, सनमोंगरा, समदुर/ समुन्दर, सरजाल/बड़ाईक, सरोरिया, सांकर, सांकल, सांकला, सांग, सांड/संहाड़, सागबाजार, सिंग,/सिंह, सिंगार, सिंगारमुंडी, सिंगारेवामन, सिकटा, सिथली, सिदार, सियार, सिलाता, सुगनापंडकी, सुगा/सुआ, सुरही, सेंदुर/सिंदूर, सोन, सोनकरायत, सोनकरौती/सोनकोठी, सोनकुकरा, सोनकुकरी, सोनकुंवर, सोनकेशर, सोनकोतरी, सोनजाल, सोनठाठ, सोनपडकी, सोनपाकेर, सोनपकरी, सोनबसरा, सोनबीर, सोनबोईर, सोनवानी, सोनाग्रे/सोनागर, हनुमान/हलमान, हरिकाटा, हरिपारु, हरिपाल/देवपहरीपाल, हस्ति/हाथी, हाटमुरार, हुंडरा, होमवंशी... योग-356

3.     समाजः “समाज” से तात्पर्य आदिवासी कंवर जनजाति के समस्त समुदाय से है, जिसकी अपनी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाज, परम्पराएँ, संस्कार तथा सांस्कृतिक मान्यताएँ हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित एवं प्रचलित हैं।

4.    विकास : “विकास” से तात्पर्य कंवर समाज के सर्वांगीण उन्नयन से है, जिसमें निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रगति एवं सशक्तिकरण सम्मिलित   हैं—

•    सामाजिक विकास

•    आर्थिक विकास

•    शैक्षणिक विकास

•    सांस्कृतिक विकास

•    नैतिक विकास

•    बौद्धिक विकास

5.   संगठनः “संगठन” से आशय कंवर समाज के लोगों द्वारा समाज की एकता, संरक्षण तथा सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से विभिन्न स्तरों पर गठित सामाजिक संरचना से है। यह संगठन निम्न स्तरों पर गठित किए जा सकते हैं—

क.    ग्राम स्तर संगठन : ग्राम या ग्राम पंचायत क्षेत्र में कंवर समाज के प्रतिनिधित्व, सामाजिक व्यवस्था के संचालन तथा समाज से संबंधित कार्यों के समन्वय हेतु गठित संगठन।

ख.    खण्ड स्तर संगठन : ब्लॉक या तहसील क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक या एक से अधिक ग्रामों के कंवर समाज को संगठित करने तथा उनके कार्यों के समन्वय के लिए गठित संगठन।

ग.     जिला स्तर संगठन : एक जिले के अंतर्गत आने वाले एक या एक से अधिक खण्ड स्तर के संगठनों के प्रतिनिधियों से मिलकर गठित संगठन।

घ.     प्रदेश स्तर संगठन : छत्तीसगढ़ राज्य स्तर पर गठित कंवर समाज का संगठन, जो राज्य स्तर पर समाज के कार्यों के समन्वय, मार्गदर्शन एवं संचालन का दायित्व निभाता है।

ङ.      अखिल भारतीय स्तर संगठन : भारत के विभिन्न राज्यों में निवासरत कंवर समाज के संगठनों के प्रतिनिधियों से मिलकर गठित राष्ट्रीय स्तर का संगठन।

2.      समिति : “समिति” से आशय किसी भी स्तर पर गठित पदाधिकारी एवं कार्यकारिणी सदस्यों के समूह से है, जो समाज के कार्यों के   संचालन एवं समन्वय के लिए उत्तरदायी होते हैं। समितियाँ निम्न स्तरों पर गठित की जा सकती हैं—

क.    ग्राम स्तरीय समिति

ख.    खण्ड (ब्लॉक/तहसील) स्तरीय समिति

ग.     जिला स्तरीय समिति

घ.     प्रदेश स्तरीय समिति

ङ.      अखिल भारतीय स्तरीय समिति

6.     सभा : “सभा” से तात्पर्य किसी भी स्तर पर आयोजित उस बैठक से है, जिसमें संगठन के सदस्य समाज से संबंधित विषयों पर   विचार-विमर्श करते हैं। सभा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

•    इसमें संबंधित स्तर के पदाधिकारी, कार्यकारिणी सदस्य तथा सामान्य सदस्य सम्मिलित हो सकते हैं।

•    यह ग्राम, खण्ड, जिला या अन्य किसी स्तर पर आयोजित की जा सकती है।

•    इसमें समाज से संबंधित सामान्य विषयों पर चर्चा कर निर्णय लिए जाते हैं।

7.   महासभा : “महासभा” से तात्पर्य व्यापक स्तर पर आयोजित संयुक्त सभा से है

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