संगठन की संरचना एवं दिशा निर्देश...

 क.    संगठनात्मक ढांचा एवं स्थापना

1.   मुख्यालय की स्थापना: प्रत्येक स्तर (ग्राम, खण्ड, जिला, प्रदेश अथवा अन्य) के संगठन का एक निर्धारित मुख्यालय होना आवश्यक होगा।

2.   सामाजिक एवं सांस्कृतिक भवन : समाज की गतिविधियों के संचालन हेतु प्रत्येक स्तर पर यथासंभव सामाजिक भवन / सांस्कृतिक भवन के निर्माण का प्रयास किया जाएगा।

3.   प्रकोष्ठों का गठन : संगठन की कार्यक्षमता एवं समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए निम्न प्रकोष्ठों का गठन किया जा सकेगा—

•    कृषक प्रकोष्ठ

•    महिला प्रकोष्ठ

•    कर्मचारी प्रकोष्ठ

•    युवा प्रकोष्ठ

        ख.     सदस्यता एवं प्रतिनिधित्व

1.   सदस्यता : कंवर समाज का प्रत्येक व्यक्ति अथवा परिवार सदस्यता ग्रहण कर संगठन का सदस्य बन सकता है।

2.   महिला प्रतिनिधित्व : संगठन के पदाधिकारियों एवं कार्यकारिणी में महिलाओं की भागीदारी कम से कम एक तिहाई (1/3) सुनिश्चित की जाएगी।

3.   सक्रिय पदाधिकारी एवं सदस्य : संगठन में सक्रिय एवं क्रियाशील पदाधिकारी तथा सदस्य होना आवश्यक होगा। यदि कोई पदाधिकारी या सदस्य निरंतर निष्क्रिय पाया जाता है, तो अध्यक्ष अथवा सभा को उसे पद या सदस्यता से पृथक करने का अधिकार होगा।

       ग.     पदाधिकारी चयन एवं कार्यकाल

1.   चुनाव / मनोनयन : संगठन के पदाधिकारी एवं कार्यकारिणी सदस्यों का प्रतिवर्ष चुनाव अथवा मनोनयन किया जाएगा।

      घ.     अनुशासन एवं राजनीतिक प्रावधान

1.   राजनीतिक पदाधिकारियों की पात्रता :

•    किसी भी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का पदाधिकारी संगठन में पदाधिकारी नियुक्त नहीं किया जाएगा।

•    ऐसे व्यक्ति को केवल कार्यकारिणी सदस्य के रूप में सम्मिलित किया जा सकेगा।

•    यदि संगठन का कोई पदाधिकारी सक्रिय राजनीति में भाग लेता है या किसी राजनीतिक दल में पद ग्रहण करता है, तो उसे तत्काल अपने पद से त्यागपत्र देना अनिवार्य होगा।

•    त्यागपत्र प्रस्तुत न करने की स्थिति में अध्यक्ष अथवा सभा द्वारा सुनवाई का अवसर प्रदान कर संबंधित पदाधिकारी को पद से पृथक किया जा सकेगा।

2.   बैठक न होने की स्थिति : यदि किसी संगठन में तीन माह की अवधि तक एक भी बैठक आयोजित नहीं होती, तो सभा अथवा उससे उच्च स्तर की समिति को पदाधिकारियों को सुनवाई का अवसर देकर वर्तमान समिति को भंग करने का अधिकार होगा।

        ङ.      बैठक एवं संचालन व्यवस्था

1.   वार्षिक सम्मेलन : ग्राम, खण्ड तथा जिला स्तर पर प्रतिवर्ष कम से कम एक बार दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन आयोजित किया जाएगा—

•    प्रथम दिवस : वार्षिक आय-व्यय, लेखा-जोखा, सामाजिक नियमों एवं समस्याओं पर चर्चा।

•    द्वितीय दिवस : प्रशिक्षण कार्यक्रम, सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम या सांस्कृतिक आयोजन।

2.   बैठकों का एजेंडा : प्रत्येक बैठक का एजेंडा पूर्व निर्धारित होगा। आवश्यकता पड़ने पर अध्यक्ष की अनुमति से अन्य विषयों पर भी चर्चा एवं निर्णय लिया जा सकेगा।

3.   लिपिकीय व्यवस्था : संगठन के आय-व्यय एवं अभिलेखीय कार्यों के संचालन हेतु आवश्यकतानुसार समाज के ही किसी सेवारत अथवा सेवानिवृत्त कर्मचारी या योग्य युवा को अंशकालिक लिपिक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। पारिश्रमिक का निर्धारण संबंधित संगठन द्वारा किया जाएगा।

        च.     वित्तीय एवं लेखा व्यवस्था

1.   रसीद एवं अभिलेख : संगठन द्वारा प्राप्त प्रत्येक शुल्क या अन्य आय के लिए रसीद देना अनिवार्य होगा तथा उसका विधिवत अभिलेख रखा जाएगा।

2.   बैंक खाता एवं वित्तीय प्रबंधन : प्रत्येक स्तर के संगठन का संयुक्त बैंक खाता खोलना अनिवार्य होगा।

•    प्राप्त राशि बैंक में जमा की जाएगी।

•    सभी आय-व्यय की प्रविष्टि कैश बुक में की जाएगी।

•    भुगतान यथासंभव चेक के माध्यम से किया जाएगा तथा संबंधित व्हाउचर सुरक्षित रखे जाएंगे।

•    वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप इंटरनेट बैंकिंग, यूपीआई आदि माध्यमों का उपयोग किया जा सकता है, किन्तु सभी लेन-देन का पूर्ण लेखा-जोखा रखना अनिवार्य होगा।

3.   हस्ताक्षरकर्ता पदाधिकारी : बैंक खाते से राशि आहरित करने के लिए अधिकृत पदाधिकारियों का निर्धारण सभा अथवा समिति द्वारा प्रस्ताव पारित कर किया जाएगा।

4.   लेखा-जोखा की पारदर्शिता:  प्रत्येक स्तर पर आय-व्यय का विधिवत लेखा-जोखा रखा जाएगा तथा उसका अनुमोदन वार्षिक सभा में सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया जाएगा।

•    यदि लेखा-जोखा सार्वजनिक नहीं किया जाता है, तो संबंधित पदाधिकारियों को अक्षम माना जाएगा।

•    ऐसी स्थिति में सभा अथवा उच्च स्तर की समिति द्वारा संगठन को भंग करने सहित आवश्यक कार्रवाई की जा सकेगी।

        छ.    नियम निर्माण एवं संगठनात्मक अधिकार

1.   उपनियम निर्माण : प्रत्येक स्तर का संगठन अपनी आवश्यकतानुसार उपनियम बना सकता है, बशर्ते वे इस मूल नियमावली की भावना के विपरीत न हों।

2.   उच्च स्तर के संगठन के प्रति प्रतिबद्धता : प्रत्येक स्तर का संगठन अपने से उच्च स्तर के संगठन के प्रति उत्तरदायी एवं प्रतिबद्ध रहेगा तथा उसके निर्णयों का पालन करना आवश्यक होगा। निर्णयों की अवहेलना की स्थिति में अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकेगी।

3.   संगठन को भंग करने का अधिकार : किसी भी स्तर के संगठन को भंग करने का अधिकार—

•    उसकी सभा को, अथवा

•    उससे उच्च स्तर के संगठन को होगा।

•    किन्तु ऐसा करने से पूर्व संबंधित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करना अनिवार्य होगा।

         ज.    मूल उद्देश्य

  1.   भाईचारा एवं सामाजिक एकता : संगठन का प्रमुख उद्देश्य समाज में भाईचारा, सहयोग एवं प्रेम भावना को विकसित करना होगा।
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